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बुलावा

Written By: Usree Bhattacharya on April 16, 2009 2 Comments

अनाथ
अकेले
क्या
वे
मेरा इंतेज़ार करते हैं
कहीं मुझे बुला रहें हैं
उस अंधकार में?
वह एक गुफा है-
जहाँ वे
खेलते हैं
हंसते हैं
हर रोज़ उनकी सच्चाई
एक दर्द है
आशा का अंत है
जहाँ न माँ का प्यार
ना पिता का आशीर्वाद.
आज कल में बदलता है
कल परसो में.
क्या वे मुझे बुलाते हैं?

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2 Responses to “बुलावा”

  1. caroline on: 1 May 2009 at 1:53 pm

    है आशा हमेशा

  2. Usree Bhattacharya on: 1 May 2009 at 2:14 pm

    🙂

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